— इतिहास, घोटाला, सुधार और आगे की राह —
छत्तीसगढ़ शराब घोटाला — खनिज संपदा से समृद्ध, जनजातीय संस्कृति से सजा, और विकास की नई करवट लेता यह राज्य — पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसे विवाद के केंद्र में रहा है जो सीधे राजनीति, भ्रष्टाचार और सामाजिक नैतिकता से टकराता है। वह विवाद है — शराब नीति (आबकारी नीति)।

शराब नीति किसी भी राज्य के लिए महज राजस्व का साधन नहीं होती। यह सामाजिक नियंत्रण, जन-स्वास्थ्य, आदिवासी संरक्षण और सरकारी पारदर्शिता का दर्पण भी है। छत्तीसगढ़ में यह दर्पण पिछले एक दशक में कई बार टूटा और जुड़ा है।
इस लेख में हम छत्तीसगढ़ की शराब नीति के विभिन्न आयामों — उसके इतिहास, कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में कथित घोटाले, भाजपा के नए सुधार, सामाजिक प्रभाव और भविष्य की दिशा — का गहन अध्ययन करेंगे।
1.छत्तीसगढ़ में आबकारी व्यवस्था : पृष्ठभूमि
छत्तीसगढ़ राज्य का गठन 1 नवंबर 2000 को हुआ। राज्य बनते ही यहाँ की आबकारी व्यवस्था अलग रूप में विकसित होने लगी। राज्य सरकार शराब की बिक्री से भारी राजस्व अर्जित करती है — यह राजस्व सड़क, स्कूल और अस्पतालों के निर्माण में काम आता है। लेकिन इसी प्रक्रिया में कई बार भ्रष्टाचार की जड़ें भी पनपती हैं।
छत्तीसगढ़ में शराब की बिक्री मुख्यतः दो माध्यमों से होती है:
1. देशी शराब (Country Liquor): यह महुआ, चावल या अन्य स्थानीय अनाज से बनती है और आदिवासी व ग्रामीण इलाकों में सबसे अधिक बिकती है।
2. विदेशी मदिरा (Indian Made Foreign Liquor – IMFL): इसमें व्हिस्की, रम, बियर जैसे ब्रांड शामिल हैं जो शहरी क्षेत्रों में अधिक लोकप्रिय हैं।
राज्य सरकार Chhattisgarh State Marketing Corporation Limited (CSMCL) के माध्यम से शराब की थोक खरीद और वितरण करती है। खुदरा बिक्री के लिए लाइसेंसी दुकानें होती हैं।
2.रमन सिंह का कार्यकाल (2003–2018): स्थिरता और नियंत्रण
भाजपा के डॉ. रमन सिंह के 15 वर्षीय शासन में आबकारी व्यवस्था अपेक्षाकृत नियंत्रित रही। राजस्व संग्रह में वृद्धि हुई लेकिन कोई बड़ा व्यवस्थागत घोटाला सामने नहीं आया। हालाँकि आलोचक यह भी कहते थे कि शराब दुकानों की संख्या बढ़ती रही और आदिवासी इलाकों में अवैध शराब की समस्या जस की तस बनी रही।
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 68 में से 90 सीटें जीतकर भाजपा को सत्ता से बेदखल किया। भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने।
3.भूपेश बघेल का कार्यकाल (2018–2023): नई नीति और विवाद
3.1 कांग्रेस की शराब नीति में बदलाव
कांग्रेस सरकार आते ही शराब व्यवसाय में कई बड़े बदलाव हुए। सरकार ने CSMCL के जरिए शराब की खरीद और वितरण की व्यवस्था को और अधिक केंद्रीकृत किया। प्रमुख परिवर्तन थे:
- डिस्टलर्स (शराब निर्माताओं) के लिए नया कोटा सिस्टम लागू किया गया
- शराब की दुकानों की संख्या और उनके स्थान में बदलाव किए गए
- CSMCL को सभी खरीद का केंद्र बनाया गया
3.2 कथित शराब घोटाला: क्या हुआ?
शराब घोटला 2019 से 2022 के बीच छत्तीसगढ़ में एक बड़े घोटाले के रूप में आया । जाँच एजेंसियों के अनुसार इस घोटाले की मुख्य कार्यप्रणाली इस प्रकार थी:
कमीशन सिस्टम: डिस्टलर्स से प्रत्येक केस (शराब के डिब्बे) पर मोटी कमीशन वसूली जाती थी। यह कमीशन नकद में ली जाती थी और सरकारी खाते में दर्ज नहीं होती थी।
नकली होलोग्राम: राज्य के 15 जिलों में नकली होलोग्राम वाली शराब बेची गई। इससे राज्य को आबकारी राजस्व का नुकसान हुआ।
कार्टेल निर्माण: बड़े डिस्टलर्स को तय बाजार हिस्सा (Fixed Market Share) देने के बदले भारी रकम वसूली गई।
समानांतर आबकारी तंत्र: जाँच एजेंसी ED ने आरोप लगाया कि पूर्व आबकारी आयुक्त निरंजन दास और CSMCL के तत्कालीन प्रबंध निदेशक अरुण पति त्रिपाठी ने मिलकर एक “समानांतर आबकारी तंत्र” चलाया जो सरकारी नियंत्रण से बाहर था।
3.3 सिंडिकेट की भूमिका
ED की जाँच में सामने आया कि अनवर ढेबर नाम के व्यवसायी की अगुवाई में एक सिंडिकेट संचालित होता था। इस सिंडिकेट ने शराब व्यापार को व्यवस्थित रूप से नियंत्रित किया। सौम्या चौरसिया को ED ने इस पूरे घोटाले का “को-आर्डिनेटर” बताया।
जाँच के प्रमुख तथ्य:
- घोटाले का अनुमानित आकार: ₹2,161 करोड़ से ₹3,200 करोड़ तक (विभिन्न जाँच एजेंसियों के अनुसार)
- आरोपी: 81 से अधिक लोग
- चार्जशीट: 29,800 पन्नों की
3.4 राजनीतिक घमासान
जब ED ने जाँच शुरू की, तो तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने ED की जाँच पर अंतरिम रोक भी लगाई। कांग्रेस सरकार का आरोप था कि केंद्र सरकार विपक्षी राज्य सरकारों को परेशान करने के लिए जाँच एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है।
4. 2023 चुनाव और सत्ता परिवर्तन
दिसंबर 2023 में विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 90 में से 54 सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया। यह भाजपा की छत्तीसगढ़ में अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। शराब घोटाला और भ्रष्टाचार के मुद्दे चुनाव में भाजपा के प्रमुख हथियार बने।
13 दिसंबर 2023 को विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ के चौथे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वे राज्य के पहले आदिवासी नेतृत्व वाले भाजपा मुख्यमंत्री हैं।
5. जाँच का नया दौर: BJP सरकार में कार्रवाई
भाजपा सरकार के आने के बाद जाँच का दायरा और तेज हुआ:
EOW-ACB की कार्रवाई: आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो और एंटी करप्शन ब्यूरो ने 30 से अधिक अफसरों के खिलाफ स्पेशल कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की।
ED की संपत्ति जब्ती: प्रवर्तन निदेशालय ने ₹205 करोड़ से अधिक की संपत्तियाँ अटैच कीं जिनमें 18 चल और 161 अचल संपत्तियाँ शामिल थीं। अनवर ढेबर की 115 संपत्तियाँ (₹116 करोड़) और पूर्व IAS अनिल तुतेजा की 14 संपत्तियाँ (₹15.82 करोड़) अटैच की गईं।
डिस्टलरी पर शिकंजा: भाटिया वाइन, वेलकम और छत्तीसगढ़ डिस्टलरी की ₹68 करोड़ की संपत्ति जब्त की गई।
बघेल परिवार पर कार्रवाई: मार्च 2025 में ED ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल के घर पर दुर्ग जिले में 14 ठिकानों पर एक साथ छापे मारे। जुलाई 2025 में ED ने चैतन्य बघेल को गिरफ्तार किया। इसके बाद ACB/EOW ने भी उन्हें गिरफ्तार किया।
अंतिम चार्जशीट: दिसंबर 2025 में ED ने 3,000 करोड़ रुपए के शराब घोटाले में अपनी अंतिम चार्जशीट दाखिल की जिसमें 81 आरोपी और 29,800 पन्नों के साक्ष्य शामिल हैं।
6. नई आबकारी नीति: सुधार की दिशा
भाजपा सरकार ने नई आबकारी नीति में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने के प्रयास किए हैं:
डिजिटलीकरण: शराब की खरीद, वितरण और बिक्री के रिकॉर्ड को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की कोशिश हो रही है ताकि मानवीय हस्तक्षेप कम हो।
होलोग्राम सत्यापन: नकली होलोग्राम की समस्या से निपटने के लिए सख्त सत्यापन तंत्र लागू किया गया है।
कार्टेल पर रोक: डिस्टलर्स को बाजार हिस्सा देने की प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
आदिवासी क्षेत्र: जनजातीय इलाकों में शराब की अवैध बिक्री और महुआ शराब पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
7. सामाजिक आयाम: शराब नीति और समाज
छत्तीसगढ़ में शराब नीति का सामाजिक पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है:
7.1 आदिवासी समाज पर प्रभाव
राज्य की जनसंख्या का लगभग 32% आदिवासी है। आदिवासी समुदायों में देशी शराब और महुआ का सांस्कृतिक महत्व है लेकिन व्यावसायिक शराब की बढ़ती पहुँच ने इन समुदायों में शराबबंदी की माँग भी तेज की है।
7.2 महिला आंदोलन
छत्तीसगढ़ में कई जिलों में महिला समूहों ने शराब दुकानों के खिलाफ आंदोलन किए हैं। घरेलू हिंसा, बाल कुपोषण और आर्थिक बर्बादी के मुद्दे शराब से जोड़े जाते हैं।
7.3 राजस्व बनाम स्वास्थ्य
एक ओर सरकार शराब से हजारों करोड़ का राजस्व जुटाती है, दूसरी ओर शराब से जुड़े स्वास्थ्य खर्च, सड़क दुर्घटनाएँ और पारिवारिक टूटन की सामाजिक लागत भी उतनी ही भारी है।
8. राजस्व पर प्रभाव
आबकारी राजस्व छत्तीसगढ़ के बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पिछले कुछ वर्षों में इसमें लगातार वृद्धि हुई है। लेकिन घोटाले के आरोपों से यह सवाल उठता है कि यदि भ्रष्टाचार न होता तो राजस्व और कितना अधिक होता। जाँच एजेंसियों का आरोप है कि ₹2,161 करोड़ से ₹3,200 करोड़ तक की रकम राजकोष में जाने की बजाय निजी जेबों में गई।
9. तुलनात्मक दृष्टि: अन्य राज्यों से सीख
बिहार का उदाहरण: बिहार में 2016 में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई। इसका राजस्व पर भारी असर पड़ा, लेकिन सामाजिक स्थिति में सुधार के दावे भी हुए। हालाँकि अवैध शराब और जहरीली शराब की समस्याएँ भी सामने आईं।
राजस्थान का उदाहरण: राजस्थान में नई आबकारी नीति में लाइसेंस प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया गया। इससे राजस्व बढ़ा और भ्रष्टाचार कम हुआ।
छत्तीसगढ़ के लिए मध्यम मार्ग — न पूर्ण शराबबंदी, न अनियंत्रित व्यापार — सबसे उचित प्रतीत होता है, लेकिन इसके लिए कड़ी पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है।
10. राजनीतिक विश्लेषण
शराब नीति छत्तीसगढ़ में एक तीखा राजनीतिक मुद्दा बन गई है:
भाजपा का रुख: भाजपा ने कांग्रेस शासन में शराब घोटाले को चुनावी मुद्दा बनाया और सत्ता में आकर जाँच तेज की। पार्टी का दावा है कि वह पारदर्शी और जनहितकारी आबकारी नीति लागू कर रही है।
कांग्रेस का रुख: कांग्रेस का कहना है कि ED और ACB की कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध है। पार्टी का तर्क है कि आबकारी राजस्व में वृद्धि और विकास कार्य उनकी सरकार की उपलब्धि थी।
जनता की राय: 2023 के चुनाव परिणाम बताते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता ने स्पष्ट रुख लिया और कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।
11. आगे की राह: क्या होनी चाहिए नीति?
एक आदर्श शराब नीति के लिए छत्तीसगढ़ को निम्नलिखित सुधारों पर ध्यान देना चाहिए:
पारदर्शी लाइसेंसिंग: आबकारी लाइसेंस की नीलामी सार्वजनिक, ऑनलाइन और प्रतिस्पर्धी आधार पर हो।
तकनीकी निगरानी: हर शराब बोतल पर QR कोड और रियल-टाइम ट्रैकिंग से नकली शराब और कालाबाजारी रोकी जा सके।
स्वतंत्र नियामक: आबकारी विभाग को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था बनाई जाए।
आदिवासी हितों की रक्षा: जनजातीय क्षेत्रों में शराब दुकानों की संख्या और स्थान निर्धारण में ग्राम सभाओं की भूमिका बढ़ाई जाए।
सामाजिक जवाबदेही: आबकारी राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत नशामुक्ति, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों पर खर्च हो।
कड़े दंड: भ्रष्टाचार और कार्टेल निर्माण पर कठोर दंड का प्रावधान हो और इसे समय पर लागू किया जाए।
“इस पूरे मामले की जांच कर रही एजेंसियों का दावा है कि शराब घोटाला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं था, बल्कि इसके लिए आबकारी नीति के नियमों का गलत फायदा उठाया गया था।”
“जब हम इस पूरे घटनाक्रम के सामाजिक और आर्थिक पहलुओं को देखते हैं, तो यह शराब घोटाला राज्य के खजाने को भारी नुकसान पहुँचाने वाला साबित होता है।”
निष्कर्ष
“संक्षेप में कहें तो, छत्तीसगढ़ का यह शराब घोटाला नीतिगत खामियों और व्यवस्था के दुरुपयोग का एक बड़ा उदाहरण है, जिसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिल रहे हैं।”
“इस प्रकार, छत्तीसगढ़ का यह शराब घोटाला नीतिगत खामियों को उजागर करता है…”
छत्तीसगढ़ की शराब नीति का इतिहास बताता है कि जहाँ लाखों-करोड़ों का राजस्व हो, वहाँ भ्रष्टाचार की जड़ें जमाना आसान है — खासकर जब व्यवस्था पारदर्शी न हो और राजनीतिक संरक्षण उपलब्ध हो।
₹3,000 करोड़ से अधिक के अनुमानित घोटाले ने यह साबित किया कि आबकारी विभाग किस तरह “हाईजैक” हो सकता है। 81 आरोपी, 29,800 पन्नों की चार्जशीट और दर्जनों जब्त संपत्तियाँ — यह सब मिलकर एक ऐसी प्रणाली की विफलता की कहानी कहते हैं जिसमें जवाबदेही लगभग शून्य थी।
विष्णु देव साय सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है — एक ओर पुराने घोटाले की जाँच पूरी करना और दोषियों को सजा दिलाना, दूसरी ओर एक ऐसी नई शराब नीति बनाना जो राजस्व के साथ-साथ पारदर्शिता, सामाजिक न्याय और जनजातीय हितों की रक्षा भी करे।
छत्तीसगढ़ की जनता — खासकर आदिवासी समुदाय, महिलाएँ और युवा — यह उम्मीद रखते हैं कि शराब नीति महज राजस्व का औजार न बनकर एक जिम्मेदार, पारदर्शी और मानवीय नीति बने। तभी यह राज्य सही अर्थों में “विकसित छत्तीसगढ़” की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
जब पैसो की बात अति है तो कोई देश प्रेमी हो वही इमानदार हो सकता है या कोई सच्चा साधू जिसे दुनिया की झमेले में नहीं पड़ना होगा नहीं तो दुनिया में अच्छे – अच्छे लोग है जिनको हजारो करोड़ो रुपयों को देख कर आंख चौंधिया जाये शराब घोटाला कोई बाहरी लोगो ने नहीं किया था अपने राज्य अपने देश के लोगो के ऊपर शराब घोटाला के आरोप लगे है और शराब घोटाला जैसे आरोप जब तक शिद्ध न हो किसी को दोसी नहीं ठराया जा सकता है !
यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी, समाचार रिपोर्टों और जाँच एजेंसियों के सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। आरोप अदालत में साबित होने तक आरोप ही हैं।