भारत विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और धार्मिक स्थलों का देश है, जहाँ हर कोने में कोई न कोई ऐसा स्थान अवश्य मिल जाता है जो सदियों से आस्था और इतिहास का केंद्र रहा हो। छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले से लगभग 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डोंगरगढ़ (Dongargarh) एक ऐसा ही अद्भुत और पवित्र नगर है। यह शहर धार्मिक विश्वास, अटूट श्रद्धा, ऐतिहासिक धरोहरों और प्राकृतिक सुंदरता का एक अनूठा संगम है।
डोंगरगढ़ का नाम सुनते ही सबसे पहले मां बम्लेश्वरी देवी का दिव्य और भव्य स्वरूप आंखों के सामने आ जाता है। यह पहाड़ी पर स्थित शक्तिरूपा मां बम्लेश्वरी देवी का विख्यात मंदिर पूरे देश में आस्था का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। यहाँ आने वाले हर श्रद्धालु को एक अलग ही प्रकार की आत्मिक शांति और ऊर्जा की अनुभूति होती है। छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्त मां के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं। आइए, इस लेख के माध्यम से डोंगरगढ़ के धार्मिक महत्व, गौरवशाली इतिहास, लोककथाओं और यात्रा से जुड़ी तमाम महत्वपूर्ण जानकारियों को विस्तार से जानते हैं।

मां बम्लेश्वरी देवी के दो विख्यात मंदिर: बड़ी और छोटी बम्लेश्वरी
डोंगरगढ़ की पहचान यहाँ की पहाड़ी पर स्थित मां बम्लेश्वरी के दो प्रसिद्ध मंदिरों से जुड़ी हुई है:
- बड़ी बम्लेश्वरी मंदिर (1600 फीट की ऊंचाई पर): डोंगरगढ़ की एक ऊंची पहाड़ी पर समुद्र तल से लगभग 1600 फीट की ऊंचाई पर पहला और मुख्य मंदिर स्थित है, जिसे बड़ी बम्लेश्वरी के नाम से जाना जाता है। इस पवित्र मंदिर तक पहुँचने के लिए पहाड़ी की ढलान पर लगभग 1000 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं। जो श्रद्धालु सीढ़ियाँ चढ़ने में असमर्थ हैं, उनके लिए यहाँ रोपवे (Ropeway) की आधुनिक और सुरक्षित सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।
- छोटी बम्लेश्वरी मंदिर (समतल पर): बड़ी बम्लेश्वरी के पहाड़ी के नीचे समतल भूभाग पर जो मंदिर स्थित है, उसे छोटी बम्लेश्वरी के नाम से जाना जाता है। जो भक्तगण ऊँची पहाड़ी पर जाने में कठिनाई महसूस करते हैं, वे समतल पर स्थित इस मंदिर में माता के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएँ मांगते हैं।
यहाँ प्रतिवर्ष कुँवार नवरात्रि (शरद नवरात्रि) और चैत्र नवरात्रि के अवसर पर दो बार विराट मेलों का भव्य आयोजन किया जाता है। इन मेलों में छत्तीसगढ़ के अलावा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और देश के अन्य राज्यों से भी लाखों की संख्या में दर्शनार्थी भाग लेते हैं। नवरात्रि के इन पावन दिनों में यहाँ प्रज्वलित होने वाले ज्योति कलश विशेष रूप से दर्शनीय होते हैं, जिन्हें देखना अपने आप में एक अलौकिक अनुभव है।

डोंगरगढ़ की प्राकृतिक सुषमा और भौगोलिक स्थिति
डोंगरगढ़ केवल धार्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह प्रकृति प्रेमियों के लिए भी किसी स्वर्ग से कम नहीं है। यह स्थान चारों तरफ से हरे-भरे वनों, छोटी-बड़ी पहाड़ियों और शांत जलाशयों से घिरा हुआ है।
- पश्चिम दिशा में: पनियाजोब जलाशय स्थित है, जो इस क्षेत्र की सुंदरता में चार चांद लगाता है।
- उत्तर दिशा में: ढारा जलाशय स्थित है।
- दक्षिण दिशा में: मड़ियान जलाशय स्थित है।
इन प्राकृतिक जल स्रोतों और घने जंगलों के बीच बसा डोंगरगढ़ चारों तरफ से प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण एक ऐसा स्थान है जहाँ मन को असीम शांति मिलती है। यहाँ का मौसम और वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
प्राचीन इतिहास और नामकरण के साक्ष्य
डोंगरगढ़ के प्राचीन इतिहास की जड़ें बहुत गहरी हैं। शोधकर्ताओं और इतिहासकारों के अनुसार, इस नगरी के कई प्राचीन नाम रहे हैं, जिनमें कामाख्या नगरी और डुंगराख्य नगर प्रमुख हैं।
कलचुरी काल और बारहवीं-तेरहवीं शताब्दी: यहाँ उपलब्ध खंडहरों और प्राचीन स्तम्भों की रचना शैली के आधार पर शोधकर्ताओं ने इसे कलचुरी काल और लगभग 12वीं से 13वीं शताब्दी ईसवी का पाया है।
गोंड़ कला का प्रभाव: यहाँ की मूर्तियों के आभूषणों, वस्त्रों, मोटे ओष्ठ (होंठ) और मस्तक के लंबे बालों का सूक्ष्म अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र की मूर्तिकला पर गोंड़ कला का गहरा प्रभाव है। इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 16वीं शताब्दी तक डुंगराख्य नगर गोंड़ राजाओं के आधिपत्य में था। गोंड़ राजा अत्यंत सामर्थ्यवान थे, जिनके राज्य में शांति, सुरक्षा और सुव्यवस्था स्थापित थी। यहाँ की प्रजा भी आर्थिक रूप से संपन्न थी, जिसके कारण यहाँ मूर्ति शिल्प और गृह निर्माण कला का एक उपयुक्त और सृजनात्मक वातावरण तैयार हुआ था।

राजा वीरसेन और माँ बम्लेश्वरी की उत्पत्ति की कथा
लोकमतानुसार, अब से लगभग 2200 वर्ष पूर्व डोंगरगढ़ के प्राचीन नाम ‘कामाख्या नगरी’ में राजा वीरसेन का शासन हुआ करता था। राजा वीरसेन बहुत ही प्रतापी और न्यायप्रिय थे, परंतु वे निःसंतान थे। पुत्र रत्न की प्राप्ति की कामना के लिए उन्होंने महिषमती पुरी (जो वर्तमान में मध्य प्रदेश के मंडला में स्थित है) में जाकर भगवान शिव और भगवती दुर्गा की कठोर उपासना की।
उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर, उनकी उपासना के फलस्वरूप रानी को एक वर्ष पश्चात पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। राजपुरोहितों और ज्योतिषियों द्वारा नामकरण संस्कार में इस बालक का नाम मदनसेन रखा गया।
चूँकि भगवान शिव और माता दुर्गा की कृपा से ही राजा वीरसेन को पुत्र की प्राप्ति हुई थी, इसलिए इसी अगाध भक्ति भाव से प्रेरित होकर राजा ने कामाख्या नगरी में मां बम्लेश्वरी (जगदम्बे महेश्वर) का भव्य मंदिर बनवाया। माता बम्लेश्वरी को ‘जगदम्बा’ के रूप में पूजा जाने लगा, जिसमें भगवान शिव यानी महेश्वर की शक्ति भी समाहित है। राजा वीरसेन के पश्चात उनके पुत्र राजा मदनसेन एक प्रजा-सेवक शासक बने। राजा मदनसेन के पुत्र का नाम राजा कामसेन था, जिनके नाम पर ही इस नगरी का नाम कामावती पुरी भी पड़ा।

कामकन्दला और माधवनल की अमर प्रेम कथा
डोंगरगढ़ के इतिहास और इसकी प्रसिद्धि में कामकन्दला और माधवनल की ऐतिहासिक एवं अमर प्रेमकथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यह कथा इस नगरी के रोम-रोम में रची-बसी है।
दरबार का प्रसंग: कामकन्दला राजा कामसेन के राजदरबार में एक अत्यंत सुंदर और कुशल नर्तकी थी, जबकि माधवनल संगीत कला में पूरी तरह निपुण एक महान संगीतज्ञ था। एक बार राजा के दरबार में कामकन्दला के नृत्य का आयोजन हुआ। नृत्य के दौरान जब ताल और सुर में हल्का सा व्यवधान आया, तो माधवनल ने तुरंत उसे पहचान लिया। उसने यह त्रुटि निकाली कि कामकन्दला के पैर की एक पायल में नग नहीं है और मृदंग बजाने वाले का एक अंगूठा नकली यानी मोम का बना हुआ है।
राजदरबार से निष्कासन और प्रेम अंकुरण: माधवनल की इस सूक्ष्म और सटीक परिकल्पना से राजा कामसेन अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी कीमती मोतियों की माला माधवनल को भेंट की। सम्मानस्वरूप माधवनल ने वही मोतियों की माला कामकन्दlar को भेंट कर दी। इस घटना से राजा कामसेन क्रोधित हो गए और उन्होंने माधवनल को राज्य से बाहर निकाल दिया। परंतु माधवनल राज्य से दूर जाने के बजाय डोंगरगढ़ की पहाड़ियों की एक गुफा में छिपकर रहने लगा। इसी प्रसंग के दौरान कामकन्दला और माधवनल के बीच प्रेम के अंकुर फूट पड़े और कामकन्दला अपनी सहेली माधवी के साथ छिपकर माधवनल से मिलने जाने लगी।
मदनादित्य का षड्यंत्र और विक्रमादित्य का आक्रमण
दूसरी ओर, राजा कामसेन का पुत्र मदनादित्य अपने पिता के स्वभाव के बिल्कुल विपरीत, निरंकुश और अत्यधिक विलासी प्रकृति का था। वह मन ही मन कामकन्दला को चाहता था और हर कीमत पर उसे पाना चाहता था। मदनादित्य के भय से कामकन्दला उसके सामने प्रेम का नाटक करने को मजबूर हो गई।
घटना का मोड़: एक रात माधवनल चोरी-छिपे कामकन्दला से मिलने उसके घर आया। उसी समय मदनादित्य भी अपने सिपाहियों के साथ वहाँ पहुँच गया। यह देखकर माधवनल पीछे के रास्ते से गुफा की तरफ भाग निकला। घर के भीतर से आवाजें आने का कारण पूछने पर कामकन्दला ने दीवारों से अकेले में बातें करने का नाटक किया। इससे मदनादित्य संतुष्ट नहीं हुआ, लेकिन वह सिपाहियों को नजर रखने का आदेश देकर महल लौट गया।
उज्जैन नरेश विक्रमादित्य का हस्तक्षेप: एक रात पहाड़ियों से वीणा की मधुर आवाज सुनकर और कामकन्दला को पहाड़ी की ओर जाते देख मदनादित्य ने उसे बंदी बना लिया और माधवनल को पकड़ने के लिए सिपाही भेजे। सिपाहियों को आते देख माधवनल वहाँ से निकल भागा और सीधे उज्जैन जा पहुँचा। उस समय उज्जैन पर महान प्रतापी और दयावान राजा विक्रमादित्य का शासन था। माधवनल की करुण प्रेम कथा सुनकर राजा विक्रमादित्य ने उसकी सहायता करने का निर्णय लिया और अपनी विशाल सेना के साथ कामाख्या नगरी पर आक्रमण कर दिया।
विध्वंस और नए रूप में डोंगरगढ़ की स्थापना
कई दिनों तक चले इस घनघोर युद्ध में अंततः राजा विक्रमादित्य की विजय हुई और अत्याचारी मदनादित्य माधवनल के हाथों मारा गया। इस भयानक युद्ध के परिणामस्वरूप वैभवशाली कामाख्या नगरी पूरी तरह से ध्वस्त हो गई। चारों तरफ केवल बड़े-बड़े डोंगर (पर्वत) ही शेष बचे रह गए, और इसी प्रकार डुंगराख्य नगर की नई पृष्ठभूमि तैयार हुई।
युद्ध समाप्त होने के बाद, राजा विक्रमादित्य ने कामकन्दला और माधवनल के प्रेम की सच्ची परीक्षा लेने के लिए एक मिथ्या सूचना फैलाई कि युद्ध में माधवनल वीरगति को प्राप्त हो गया है। यह दुखद समाचार सुनते ही कामकन्दला ने एक तालाब में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए। वह तालाब आज भी कामकन्दला तालाब के नाम से विख्यात है।
उधर, कामकन्दला के इस आत्मोत्सर्ग से दुखी होकर माधवनल ने भी अपने प्राण त्यागने का प्रयास किया, लेकिन माँ बगुलामुखी की कृपा से उसने वरदान माँगा कि माँ अपने जागृत रूप में इस पहाड़ी पर हमेशा के लिए प्रतिष्ठित हों। तभी से माँ बगुलामुखी का अपभ्रंश रूप बमला देवी या बम्लेश्वरी देवी साक्षात महाकाली के रूप में डोंगरगढ़ की पहाड़ियों पर विराजमान हैं।
आधुनिक काल और ट्रस्ट द्वारा संचालन
आधुनिक इतिहास की बात करें तो सन् 1964 में खैरागढ़ रियासत के भूतपूर्व नरेश श्री राजा वीरेन्द्र बहादुर सिंह द्वारा इस भव्य मंदिर के संचालन, विकास और व्यवस्था का संपूर्ण भार ‘मां बम्लेश्वरी ट्रस्ट कमेटी’ को सौंप दिया गया। तब से लेकर आज तक यह ट्रस्ट मंदिर की देखरेख, यात्रियों की सुविधाओं और मेलों के सफल आयोजन का जिम्मा पूरी निष्ठा के साथ संभाल रहा है।
यात्रियों और पर्यटकों के लिए उपलब्ध सुविधाएँ
छत्तीसगढ़ का समस्त जन-समुदाय डोंगरगढ़ को अपना सबसे बड़ा और पवित्र तीर्थ मानता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिए प्रशासन और ट्रस्ट द्वारा बेहतरीन प्रबंध किए गए हैं:
आवास व्यवस्था: श्री बम्लेश्वरी मंदिर ट्रस्ट समिति, डोंगरगढ़ द्वारा संचालित धर्मशालाएँ और शहर में कई आधुनिक व आरामदायक निजी होटल्स उपलब्ध हैं, जहाँ ठहरने की उत्तम व्यवस्था है।
भोजन और अन्य सुविधाएँ: पहाड़ों के ऊपर और नीचे दोनों स्थानों पर पेयजल की समुचित व्यवस्था, विद्युत प्रकाश (रोशनी), विश्रामालय, भोजनालय तथा धार्मिक सामग्री व प्रसाद खरीदने के लिए दुकानें उपलब्ध हैं।
यातायात के साधन (कैसे पहुँचें):
- वायु मार्ग (Airport): रायपुर (लगभग 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित) निकटतम हवाई अड्डा है, जो मुंबई, दिल्ली, नागपुर, हैदराबाद, बेंगलुरु, विशाखापत्तनम और चेन्नई जैसे प्रमुख शहरों से नियमित उड़ानों से जुड़ा हुआ है।
- रेल मार्ग (Railway): डोंगरगढ़ हावड़ा-मुंबई मुख्य रेल मार्ग के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण रेलवे जंक्शन है, जहाँ देश के कई बड़े शहरों से ट्रेनें सीधे रुकती हैं।
- सड़क मार्ग (Road): यह नगर रायपुर (100 कि.मी.) और राजनांदगांव (36 कि.मी.) से पक्की सड़कों द्वारा अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। यहाँ के लिए नियमित बस सेवाएँ, कैब और टैक्सियाँ आसानी से मिल जाती हैं।
डोंगरगढ़ केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि यह भारत के प्राचीन गौरव, अमिट प्रेम कथाओं, गोंड़ और कलचुरी कला के इतिहास तथा छत्तीसगढ़ की संस्कृति का एक जीता-जागता प्रतीक है। पहाड़ियों की ऊँचाइयों पर माँ बम्लेश्वरी की घंटियों की गूँज, नीचे कल-कल बहते जलाशयों का जल और इतिहास के पन्नों में दबी माधवनल-कामकन्दला की प्रेम गाथा इस स्थान को हर यात्री के लिए एक अवश्य देखने योग्य स्थल बनाती है। यदि आप आध्यात्मिक शांति, प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक रहस्यों को एक साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो डोंगरगढ़ की यात्रा आपके जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक होगी।
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