छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कुछ ही दूरी पर स्थित माना का शदाणी दरबार आज सिर्फ राज्य का ही नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया के सिंधु समाज का एक प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था का केंद्र है। 17वीं शताब्दी के महान संत संत शदाराम जी महाराज की पावन स्मृति में बना यह भव्य तीर्थ स्थल अपनी अद्भुत कला, इतिहास और लोक-कल्याणकारी मान्यताओं के लिए देश-विदेश में विख्यात है।
अगर आप शांति, आध्यात्मिकता और छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को करीब से अनुभव करना चाहते हैं, तो शदाणी दरबार की यात्रा आपके लिए बेहद खास होगी। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक और पवित्र तीर्थ स्थल के बारे में विस्तार से।

कहाँ स्थित है और कैसे पहुँचे?
दूरी: यह रायपुर मुख्य शहर से लगभग 8 किलोमीटर दूर, रायपुर-जगदलपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर माना के पास स्थित है।
परिसर: लगभग 12 एकड़ के विशाल क्षेत्र में फैला यह दरबार चारों तरफ से भव्य चहारदीवारी से घिरा हुआ है।
आसानी से पहुँच: रायपुर राजधानी से यहाँ पहुँचना बेहद आसान है। आप निजी वाहन, टैक्सी या सिटी बस के जरिए आसानी से जा सकते हैं। इस मार्ग पर 24 घंटे आवागमन की सुविधा उपलब्ध है।
शदाणी दरबार का गौरवशाली इतिहास
इस दरबार की जड़ें इतिहास और महान संतों के तप से जुड़ी हैं:
- प्रकट और यात्रा: संत शदाराम जी महाराज का जन्म 1708 ईस्वी में पंजाब के लाहौर शहर में हुआ था। बाल्यावस्था से ही वे ईश्वर भक्ति और लोक-कल्याण में लीन रहते थे। धर्म प्रचार करते हुए वे लाहौर, सुल्तान, पशुपतिनाथ मंदिर, हरिद्वार, दिल्ली, कुरुक्षेत्र, पानीपत और पुष्कर से होते हुए सन् 1768 में ऐतिहासिक नगर माथेलो (सिंध) पहुँचे।
- अत्याचारी शासन का अंत: माथेलो में उस समय क्रूर शासक गुलाम Shah कल्होड़ा के जुल्मों से त्रस्त भक्त प्रार्थना कर रहे थे। संत महाराज जी ने वहाँ धुनी रमाकर तपस्या की, जिससे वहाँ सुख-शांति और सदाचार का माहौल बना। हिंदुओं और मुसलमानों में एकता और भाईचारा बढ़ा, जिससे अत्याचारी शासक का शासन समाप्त हो गया। तभी से उन्हें शिव अवतारी माना जाने लगा।
- स्थापना: सन् 1786 में संत शदाराम जी ने ‘हयात पिताफी’ नामक स्थान पर स्थायी डेरा डालकर शदाणी दरबार की नींव रखी। परलोक गमन से पहले उन्होंने अपने प्रिय शिष्य संत तुलसीदास जी को आशीर्वाद दिया कि यह स्थान हमेशा अमर रहेगा और जो भी भक्त श्रद्धा से धुणी और जल ग्रहण करेगा, उसके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।

मंदिर की भव्यता और मुख्य आकर्षण
सन् 1990 में सिन्धु संप्रदाय के अष्टम संत गोविंदराज जी महाराज की देखरेख में माना, रायपुर में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। यहाँ की विशेषताएँ इसे खास बनाती हैं:
- संतों की जीवंत मूर्तियाँ: गर्भगृह के भीतर और बाहर दाहिनी-बाईं ओर शदाणी दरबार के आठ पूर्व परम संतों की संगमरमर से बनी जीवंत मूर्तियाँ स्थापित हैं।
- 240 वर्ष प्राचीन कलश: यहाँ वेद मंदिर माथेला (सिंध) से निकला 240 वर्ष पुराना प्राचीन कलश सुशोभित है। साथ ही, पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब भी विराजमान हैं।
- माता हासी देवी की खाट साहिब: दाहिने कोने पर पंचम संत माता हासीदेवी की ऐतिहासिक खाट साहिब विराजमान है, जो श्रद्धालुओं के कष्टों का हरण करने के वरदान से परिपूर्ण मानी जाती है।
- कांच की कलात्मक नक्काशी: मुख्य मंदिर की भीतरी दीवारों पर काँच की अत्यंत खूबसूरत और कलात्मक नक्काशी की गई है, जिसमें विभिन्न देवी-देवताओं और 24 अवतारों की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।
- तुलसी सरोवर और धुणी साहिब: संत तुलसीदास के आशीर्वाद स्वरूप बना तुलसी सरोवर और दरबार के गर्भगृह में स्थित दुख-भंजन धुणी साहिब यहाँ की मुख्य आस्था का केंद्र हैं। मान्यता है कि इसकी भभूत और अमृत रूपी जल के सेवन से सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं।

विशेष उत्सव और मेले
मासिक मेला: शदाणी दरबार में प्रत्येक माह शुक्ल पक्ष की चौदस को भव्य मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु सत्संग, दर्शन और भंडारे का लाभ उठाते हैं।
वार्षिक उत्सव: यहाँ देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देश पाकिस्तान (सिंध) से भी श्रद्धालु प्रतिवर्ष जुलाई माह में पंचम संत माता हासीदेवी के जन्मोत्सव और 25 अक्टूबर को अष्टम संत गोविन्दराम जी के जन्मोत्सव में शामिल होने आते हैं।

रायपुर का माना स्थित शदाणी दरबार केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि प्रेम, भाईचारा, सेवा और आध्यात्मिक शांति का एक अनूठा संगम है। छत्तीसगढ़ की धार्मिक अस्मिता का परिचायक यह तीर्थ स्थल हर यात्री और श्रद्धालु को आंतरिक शांति का अहसास कराता है। अगर आपने अभी तक इस पवित्र स्थान के दर्शन नहीं किए हैं, तो अपनी अगली यात्रा में शदाणी दरबार जरूर शामिल करें।
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