छत्तीसगढ़ का प्रयाग: ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी ‘राजिम’ की संपूर्ण जानकारी

राजिम

1. धार्मिक महत्व और राजिम माघ पूर्णिमा मेला

क्षेत्रीय लोगों की गहरी आस्था है कि राजिम के त्रिवेणी संगम पर स्नान करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु के उपरांत विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। यहां श्राद्ध, तर्पण, पर्वस्नान और दान जैसे धार्मिक कृत्य बड़े पैमाने पर किए जाते हैं।

  • महाशिवरात्रि और पुन्नी मेला: यहां का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है, जो माघ मास की पूर्णिमा से शुरू होकर फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि (कृष्णपक्ष त्रयोदशी) तक चलता है।
  • इस दौरान छत्तीसगढ़ के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु त्रिवेणी संगम में स्नान करने और भगवान राजीवलोचन व कुलेश्वर महादेव के दर्शन करने पहुंचते हैं।
  • मान्यता है कि भगवान जगन्नाथपुरी की यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है, जब तक कोई राजिम की यात्रा न कर ले।
राजिम

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पुरातात्विक महत्व

राजिम केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि इतिहास और पुरातत्व प्रेमियों के लिए भी एक खजाना है। यहां से मिले विभिन्न शिलालेखों और अवशेषों ने छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास पर बड़ा प्रकाश डाला है:

  • अज्ञात नरेश विक्रमादित्य: राजिम के पास स्थित पितईबंद ग्राम से प्राप्त मुदानिधि से पहली बार विक्रमादित्य नामक सर्वथा अज्ञात नरेश की ऐतिहासिकता और महेन्द्रादित्य के साथ उनके पारिवारिक संबंधों की जानकारी मिलती है।
  • नलवंश और कलचुरी वंश: राजीवलोचन मंदिर से प्राप्त शिलालेख बिलासतुंग के नलवंश की जानकारी का एकमात्र साधन हैं। इसके अलावा, कलचुरी नरेश जाजल्यदेव प्रथम और रत्नदेव द्वितीय की विजयों का उल्लेख भी यहां के शिलालेखों में मिलता है।
  • ताम्राश्म युग: व्यापक मृण्मय (मिट्टी के) अवशेषों के अध्ययन से यह प्रमाणित हुआ है कि राजिम में पल्लवित संस्कृति का प्रारंभ ताम्राश्म (Chalcolithic) युग में हुआ था।
राजिम

3. राजिम के प्रमुख देवालय (मंदिर समूह)

राजिम के देवालयों को उनकी स्थिति के आधार पर मुख्य रूप से चार समूहों में बांटा गया है:

(क) पश्चिमी समूह

कुलेश्वर महादेव मंदिर (9वीं सदी): यह मंदिर महानदी, सोंदूर और पैरी नदी के संगम पर एक ऊंची अष्टभुजाकार जगती (17 फीट ऊंची) पर बना है। नदी की बाढ़ से सुरक्षा के लिए इसे अष्टभुजाकार बनाया गया है। मंदिर तक पहुंचने के लिए कुल 31 सीढ़ियां हैं।

पंचेश्वर महादेव (9वीं सदी) और भूतेश्वर महादेव (14वीं सदी) के मंदिर भी इसी समूह में आते हैं।

(ख) मध्य समूह

राजीवलोचन मंदिर (7वीं सदी): नलवंशी नरेश बिलासतुंग के अभिलेख के आधार पर इसे 7वीं शताब्दी का माना जाता है। यह एक विशाल आयताकार प्रकोष्ठ के मध्य में स्थित है। इसके गर्भगृह में काले पत्थर की भगवान विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति (राजीवलोचन) स्थापित है। महामण्डप के स्तंभों और दीवारों पर कल्पलता, गंगा-यमुना, नृसिंह अवतार और सुंदर मूर्तियां उकेरी गई हैं।

इस समूह में वामन, वाराह, नृसिंह, बद्रीनाथ, जगन्नाथ, राजेश्वर और राजिम तेलिन मंदिर भी शामिल हैं।

(ग) पूर्वी समूह

रामचन्द्र मंदिर (8वीं सदी): यह मूलतः ईंटों से बना हुआ मंदिर है, जिसका जीर्णोद्धार रतनपुर के कलचुरी नरेश के सामंत जगतपालदेव द्वारा करवाया गया था। इसके स्तंभों पर शालभंजिका, वीणा वादक और नर्तकियों की मनोहारी मूर्तियां उत्कीर्ण हैं।

(घ) उत्तरी समूह

सोमेश्वर महादेव मंदिर: यह मंदिर वर्तमान बस्ती के पास नदी तट से थोड़ा हटकर स्थित है। स्थापत्य की दृष्टि से इसके महामण्डप के स्तंभ प्राचीन और राजीवलोचन मंदिर से समानता रखते हैं।

राजिम

4. ठहरने और घूमने की व्यवस्था (Accommodation)

यदि आप राजिम घूमने की योजना बना रहे हैं, तो रुकने के लिए निम्नलिखित विकल्प उपलब्ध हैं:

  • छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल का 6 कमरों का पुन्नी रिसॉर्ट
  • लोक निर्माण विभाग (PWD) का विश्रामगृह
  • अधिक आरामदायक सुविधाओं के लिए रायपुर में विभिन्न प्रकार के होटल्स आसानी से मिल जाते हैं।
राजिम

5. राजिम कैसे पहुंचें? (How to Reach)

  • वायु मार्ग (By Air): निकटतम हवाई अड्डा रायपुर (45 किमी दूर) है, जो देश के प्रमुख महानगरों (मुंबई, दिल्ली, नागपुर, हैदराबाद, बेंगलुरु, कोलकाता आदि) से जुड़ा हुआ है।
  • रेल मार्ग (By Train): निकटतम रेलवे स्टेशन रायपुर है, जो हावड़ा-मुंबई मुख्य रेलमार्ग पर स्थित है।
  • सड़क मार्ग (By Road): राजिम नियमित बस और टैक्सी सेवाओं के माध्यम से रायपुर और महासमुंद से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है।

टिप: यदि आप छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति और प्राचीन वास्तुकला को अपनी आँखों से देखना चाहते हैं, तो महाशिवरात्रि या माघ पूर्णिमा के मेले के दौरान राजिम की यात्रा जरूर करें।

One thought on “छत्तीसगढ़ का प्रयाग: ऐतिहासिक और धार्मिक नगरी ‘राजिम’ की संपूर्ण जानकारी”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *