
छत्तीसगढ़ के मध्य भाग में स्थित तुरतुरिया गांव, भारतीय पौराणिक इतिहास, पुरातात्विक संपदा और धार्मिक आस्था का एक अमूल्य केंद्र है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह वही पवित्र स्थान है जहां महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था और जहां भगवान राम के पुत्रों लव और कुश का जन्म हुआ था। आज तुरतुरिया न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत के हिंदू समाज के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल और ऐतिहासिक धरोहर है।
रामायण में तुरतुरिया का वर्णन
माता सीता का वनवास: जब भगवान राम को राजधर्म के पालन हेतु माता सीता का त्याग करना पड़ा, तब गर्भवती माता सीता ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में शरण ली थी। मान्यता है कि यह तपोवन वर्तमान छत्तीसगढ़ का तुरतुरिया क्षेत्र ही है।
लव और कुश का जन्म: ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में ही माता सीता ने अपने दोनों पुत्रों – लव और कुश को जन्म दिया। ये दोनों भाई वाल्मीकि के आश्रम में पले-बढ़े। यहीं महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें वेद, शास्त्र और युद्ध कला की शिक्षा दी, जिसके बल पर उन्होंने भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोका था।
तुरतुरिया की भौगोलिक स्थिति और नाम का रहस्य
छत्तीसगढ़ में स्थान: तुरतुरिया छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में स्थित है। यह प्राकृतिक सुंदरता से परिपूर्ण बारनवापारा वन्यजीव अभयारण्य के घने जंगलों के बीच बसा हुआ है।
नाम की उत्पत्ति: तुरतुरिया का नाम यहाँ स्थित एक प्राकृतिक जलस्रोत के कारण पड़ा है। पहाड़ियों के बीच से एक प्राकृतिक झरना बहता है, जिसे स्थानीय लोग ‘सुरसुरी गंगा‘ कहते हैं। इस झरने का पानी गोमुख से निकलता है और जब पानी नीचे गिरता है, तो उससे निरंतर ‘तुर-तुर’ की ध्वनि उत्पन्न होती है। इसी ध्वनि के कारण इस गांव का नाम “तुरतुरिया” पड़ा।
समीपवर्ती महत्वपूर्ण स्थल
सिरपुर: प्राचीन ऐतिहासिक और पुरातात्विक नगरी (लगभग 25-30 किमी दूर)

बारनवापारा अभयारण्य: वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध

रायपुर: छत्तीसगढ़ की राजधानी (लगभग 85 किमी दूर)
तुरतुरिया की पौराणिक और ऐतिहासिक महत्ता
वाल्मीकि आश्रम और लव-कुश मंदिर: तुरतुरिया का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल लव-कुश मंदिर और वाल्मीकि आश्रम है। यहाँ माता सीता, महर्षि वाल्मीकि और लव-कुश की प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं।
सुरसुरी गंगा की पवित्रता: सुरसुरी गंगा के जल को अत्यंत पवित्र माना जाता है और श्रद्धालु इसे तीर्थ जल के रूप में ग्रहण करते हैं।

बौद्ध और जैन पुरावशेष: रामायण काल के अलावा, तुरतुरिया का एक समृद्ध प्रमाणित इतिहास भी है। पुरातत्व विभाग को यहाँ 8वीं शताब्दी के बौद्ध विहार (बौद्ध भिक्षुणियों का निवास) के अवशेष मिले हैं। साथ ही, यहाँ भगवान विष्णु और जैन तीर्थंकरों की कई प्राचीन मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं।

तुरतुरिया का सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व
आध्यात्मिक पर्यटन: हर साल हजारों तीर्थयात्री और पर्यटक तुरतुरिया आते हैं। विशेषकर पौष पूर्णिमा, रामनवमी और महाशिवरात्रि के समय यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
छत्तीसगढ़ की पहचान: तुरतुरिया छत्तीसगढ़ की प्राचीन सभ्यता, धार्मिक सहिष्णुता (हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म का संगम) और परंपरा को दर्शाता है।
छत्तीसगढ़ में अन्य राम-वन-गमन और संबंधित स्थल तुरतुरिया के अलावा, छत्तीसगढ़ (जिसे प्राचीन काल में दक्षिण कोसल और दंडकारण्य कहा जाता था) में राम से संबंधित कई अन्य महत्वपूर्ण स्थल हैं:
सीतामढ़ी हरचौका (कोरिया): राम के वनवास काल में छत्तीसगढ़ में प्रवेश का प्रथम स्थान।
रामगढ़ (सरगुजा): यहाँ स्थित सीताबेंगरा और जोगीमारा गुफाएं राम के वनवास से जुड़ी मानी जाती हैं।
शिवरीनारायण (जांजगीर-चांपा): माना जाता है कि यहाँ भगवान राम ने माता शबरी के जूठे बेर खाए थे।
जगदलपुर और दंडकारण्य (बस्तर): राम के वनवास के समय का महत्वपूर्ण मार्ग और आदिवासी संस्कृति व रामायण कथा का अद्भुत मिश्रण।
तुरतुरिया यात्रा: व्यावहारिक जानकारी
कैसे पहुंचें:
- हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, रायपुर है।
- ट्रेन से: निकटतम रेलवे स्टेशन भाटापारा और रायपुर जंक्शन हैं।
- सड़क मार्ग: बलौदाबाजार या रायपुर से सिरपुर होते हुए निजी वाहन या टैक्सी द्वारा बारनवापारा अभयारण्य के रास्ते यहाँ आसानी से पहुँचा जा सकता है।
ठहरने की व्यवस्था: बारनवापारा में वन विभाग के रिसॉर्ट्स उपलब्ध हैं। इसके अलावा सिरपुर, बलौदाबाजार और रायपुर में रुकने की अच्छी व्यवस्था है।
तुरतुरिया केवल एक गांव नहीं है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और धार्मिक आस्था का एक जीवंत प्रतीक है। बारनवापारा के घने जंगलों में गूँजती ‘तुर-तुर’ की ध्वनि आज भी माता सीता के त्याग, लव-कुश की वीरता और महर्षि वाल्मीकि के ज्ञान की गवाही देती है। जो कोई भी इस पवित्र भूमि पर आता है, वह न केवल एक तीर्थ यात्रा पूरी करता है, बल्कि प्रकृति और भारतीय संस्कृति की जड़ों से गहराई से जुड़ता है।