कभी मेरी धार इतनी तेज़ थी कि पत्थर भी राह देते थे।
कभी मेरे किनारे पर हाथी नहाते थे, आदिवासी गीत गाते थे।
आज… मेरी रेत पर केवल कोयले की राख है।
मैं हसदेव हूँ — और मुझे बचाने वाला कोई नहीं?

हसदेव नदी

छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा

हसदेव नदी छत्तीसगढ़ के मैकल पर्वत श्रेणी से उत्पन्न होकर सरगुजा, कोरिया और कोरबा जिलों से होती हुई महानदी में मिलती है। इस नदी की कुल लंबाई लगभग ३२३ किलोमीटर है। इस नदी के किनारे हसदेव अरण्य का घना जंगल है — जो लगभग १ लाख ७० हजार हेक्टेयर में फैला हुआ है और जैव विविधता की दृष्टि से देश के सबसे समृद्ध वन क्षेत्रों में से एक माना जाता है।

इस नदी पर बना हसदेव बांगो बांध कोरबा और आसपास के जिलों की कृषि, पेयजल और बिजली की ज़रूरतें पूरी करता है। लाखों किसान, गोंड और अन्य आदिवासी परिवार और अनगिनत जंगली जीव इस नदी पर अपने अस्तित्व के लिए निर्भर हैं।

१.७ लाखहेक्टेयर हसदेव अरण्य का जंगल

१०,०००+आदिवासी परिवार इस जंगल में बसे

१२ सालसे चल रहा बचाओ आंदोलन

१०.२ लाख पेड़ काटे जाने का खतरा


क्यों सूख रही है ? — प्रमुख कारण

यह नदी अकेले नहीं मर रही — इसे इंसानी स्वार्थ मार रहा है। विकास के नाम पर जो घाव दिए जा रहे हैं, वो इतने गहरे हैं कि शायद यह नदी फिर कभी न उठ सके।

हसदेव नदी

कोयला खनन

हसदेव अरण्य के भीतर दर्जनों कोयला खदानें खोदी जा रही हैं। जंगल की जड़ें उखड़ती हैं तो नदी का स्रोत भी सूखने लगता है। बड़े पैमाने पर भूमिगत जलस्रोत नष्ट हो रहे हैं।

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जंगल की अंधाधुंध कटाई

लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं। पेड़ न रहे तो वर्षा कम होती है, ज़मीन पानी नहीं सोखती और नदियाँ धीरे-धीरे सूखने लगती हैं। पेड़ ही नदी का जीवन हैं।

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बिजलीघरों का प्रदूषण

थर्मल पावर प्लांट की राख और अपशिष्ट नदी में बहाया जाता है। पानी ज़हरीला होता है, जलीय जीव मरते हैं और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र टूट जाता है।

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अत्यधिक जल दोहन

खदानों और उद्योगों द्वारा अंधाधुंध पानी खींचा जा रहा है। गर्मियों में नदी का पेट रेत से भरा और पानी से खाली दिखता है — यह भविष्य की तस्वीर है।

“जंगलों के कटने से निकट भविष्य में हसदेव नदी के अस्तित्व पर संकट आने वाला है, जिससे लाखों हेक्टेयर कृषि खत्म हो जाएगी। छत्तीसगढ़ की जनता हसदेव नदी और जंगल बचाने के लिए एकजुट है।”

— हसदेव नदी–जंगल बचाओ अभियान

हसदेव नदी

💔क्या खो रहे हैं हम?

जब हसदेव मरती है, तो उसके साथ सिर्फ पानी नहीं — एक पूरी सभ्यता, एक पूरा जीवन मरता है:

  • ✕पक्षियों की८२ प्रजातियाँऔर लगभग१७० प्रकार के पौधे— सब खतरे में हैं
  • ✕हज़ारोंआदिवासी परिवारों की आजीविका— जड़ी-बूटी और वन संसाधन — नष्ट हो जाएगी
  • ✕कोरबा क्षेत्र केलाखों किसानों की सिंचाईका संकट गहराएगा
  • हाथी, तेंदुआऔर अन्य वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास उजड़ जाएगा
  • पीने के पानी का गंभीर संकट— आने वाली पीढ़ियों के लिए
  • ✕छत्तीसगढ़ कीप्राकृतिक विरासत और पर्यटनका स्थायी विनाश

सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जिन ४९ कोयला परियोजनाओं के लिए वनों के डायवर्जन की अनुमति दी गई है, उसके कारण १९,६१४ हेक्टेयर वनभूमि प्रभावित होगी और लगभग १०,१५१ परिवार बेदखल होंगे।

✊आवाज़ उठ रही है — हसदेव बचाओ आंदोलन

यहाँ के गोंड और अन्य आदिवासी समुदाय पिछले १२ सालों से अपनी माँ हसदेव को बचाने के लिए लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ विधानसभा ने जुलाई २०२२ में सर्वसम्मति से हसदेव अरण्य में सभी कोयला खदानों की अनुमतियाँ रद्द करने का प्रस्ताव पारित किया। छत्तीसगढ़ सरकार ने खुद सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दे कर किसी नई कोयला खदान को गैरज़रूरी बताया — फिर भी पेड़ काटे जा रहे हैं और खनन जारी है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं की चेतावनी है — “तीसरी खदान मिलने के बाद न रामगढ़ बचेगा, न हसदेव और न बांगो का पानी। यह पूरे छत्तीसगढ़ के पर्यावरण का विनाश है।”

  • हसदेव अरण्य में सभी कोयला खनन तुरंत बंद हो
  • काटे गए जंगल के स्थान पर व्यापक वृक्षारोपण किया जाए
  • आदिवासियों की ग्राम सभाओं की सहमति अनिवार्य हो
  • नदी को प्रदूषित करने वाले उद्योगों पर सख्त कार्रवाई हो
  • हसदेव को राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित नदी घोषित किया जाए

🌱अंत में — एक सवाल

हम कोयले से बिजली बनाते हैं, बिजली से चमक पैदा करते हैं — लेकिन जब हसदेव जैसी नदियाँ सूख जाएंगी, जब जंगल उजड़ जाएंगे, जब आदिवासी अपने घर से बेदखल हो जाएंगे — तब उस बिजली से रोशन घरों में क्या रहेगा?

एक नदी सिर्फ पानी नहीं होती। वो सभ्यता होती है, संस्कृति होती है, जीवन होती है। हसदेव को बचाना मतलब आने वाली पीढ़ियों को जीवन देना है। यह लड़ाई सिर्फ आदिवासियों की नहीं — यह हम सबकी लड़ाई है।

हसदेव की पुकार सुनो —अब भी वक्त है

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हसदेव नदी
One thought on “मैं हसदेव नदी हूँ —और मैं मर रही हूँ”
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